
लखनऊ की गलियों में रविवार को सिर्फ एक जुलूस नहीं निकला, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा ने फिर से शहर की रगों में इतिहास दौड़ा दिया। 19वीं रमजान के मौके पर ‘गिलीम’ यानी कंबल के ताबूत का पारंपरिक जुलूस जब सड़कों पर उतरा, तो काले लिबास में हजारों अकीदतमंद गम और इबादत के रंग में डूब गए। हर तरफ बस एक ही आवाज गूंज रही थी, “या अली… या हुसैन…” और पूरा शहर एक गहरे आध्यात्मिक माहौल में बदल गया।
लखनऊ की सड़कों पर उमड़ा अकीदत का सैलाब
करीब चार किलोमीटर लंबे इस जुलूस में शिया समुदाय के हजारों लोग शामिल हुए। पुरुष, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सभी एक ही मकसद से सड़कों पर निकले थे, अपनी अकीदत और गम का इजहार करने।
जुलूस शहर के कई अहम इलाकों से होकर गुजरा। रास्ते भर लोग जुलूस के इंतजार में खड़े नजर आए, मानो इतिहास की एक झलक गुजरने वाली हो।
ताबूत को छूने के लिए उमड़ी भीड़
जुलूस के दौरान ‘गिलीम’ ताबूत अकीदत का सबसे बड़ा केंद्र रहा। लोग ताबूत को देखने, छूने और चूमने के लिए आगे बढ़ते दिखाई दिए। कई श्रद्धालु ताबूत के पास पहुंचकर दुआ मांगते और अपने परिवार की सलामती की फरियाद करते नजर आए। उस पल भीड़ में मौजूद हर शख्स के चेहरे पर श्रद्धा और गम साफ पढ़ा जा सकता था।
हर तरफ गूंजा “या अली, या हुसैन”
जुलूस के दौरान पूरा माहौल मातमी हो गया। शिया समुदाय के लोग काले कपड़े पहनकर मातम करते दिखाई दिए।
जगह-जगह से उठती “या अली” और “या हुसैन” की सदाएं इस बात का एहसास दिला रही थीं कि यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था और इतिहास की जीवंत याद है।

क्यों खास है रमजान की 19वीं तारीख
इस्लामी इतिहास में रमजान की 19वीं तारीख बेहद अहम मानी जाती है। मान्यता के अनुसार इसी दिन हजरत अली पर हमला हुआ था। शिया समुदाय इस दिन को याद करते हुए मातम, इबादत और जुलूस के जरिए अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है। लखनऊ में ‘गिलीम’ ताबूत का जुलूस इसी ऐतिहासिक याद का प्रतीक माना जाता है।
सुरक्षा के साए में संपन्न हुआ जुलूस
इतनी बड़ी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी पूरे रूट पर तैनात रहे ताकि जुलूस शांतिपूर्ण तरीके से पूरा हो सके।
रास्ते में कई जगहों पर स्थानीय लोगों ने पानी और राहत की व्यवस्था भी की, जिससे जुलूस में शामिल लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो।
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